जीवन है हलचल और परिवर्तन

“जीवन है हलचल और परिवर्तन” ?
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क्या है सही ? है क्या गलत ?
कौन है दोस्त ? है कौन दुश्मन ?
कौन है अपना ? और कौन पराया ?
क्या है पाप ? क्या है पुण्य ?
पुत्र, जो था परेशान इन बड़ी द्विधाओं में ,
सहसा अपने पिता से प्रश्न यह कर ही डाला………..?

‘पिता’,
ठहरा ग्रीहस्थ आदमी,
दो जून रोटी की समस्या, और उसकी व्यवस्था,
था, उसका परम धर्म और कर्तव्य ?
सारी ज़िन्दगी जिसने की व्यतीत, दो से चार, चार से आठ करने में,
पाया अपने को आज गहरी मुसीबत में ?
स्वॅम को बिलकुल ही लाचार पा रहा था आज वह ?
फिर भी हिम्मत जुटाई, और पूछा अपने पुत्र से ?
क्यों ? आवश्यक है क्या इसका उत्तर जानना ?

हमारे पुरखों में से तो कभी भी किसी ने नहीं उठाया यह प्रश्न ?
फिर आज अचानक ? यह क्या हो गया है तुम्हारी मति को ?
आज तुमने पूछ डाला कुछ इस तरह यह प्रश्न मुझसे
जैसे कभी श्वेतांक ने पूछा था ? महाप्रभु रत्नांबर से
“!…………………………………….और पाप ?……………!’’

एक गहरी निद्रा से चौंक उठे थे तब महाप्रभु रत्नांबर
बड़े ही ध्यान से देखा था श्वेतांक की ओर उन्होंने
और कहा, प्रश्न है स्वाभाविक हे वत्स ? पर साथ ही बड़ा कठिन ?
क्या है यह पाप……… ? कहाँ है इसका निवास……..?

अविकल परिश्रम करने के बाद,
अनुभव के सागर में उतराने के बाद
भगवती चरण वर्मा जैसे महापुरुष ने,
लिख डाली थी एक अति अविस्मरणीय पुस्तक ‘चित्रलेखा’
फिर भी सुलझा न पाये पाप और पुण्य की परिभाषा ?
बनी रही असमंजस की स्तिथि अंत तक ?

श्वेतांक ने तो एक ही प्रश्न पूछा था, महाप्रभु रत्नांबर से ?
पर यहाँ तो तुमने एक ही साथ कितने प्रश्न कर डाले हैं
जानना ही चाहते हो इन प्रश्नों के उत्तर यदि तुम,
तो तुम्हें स्वॅम ही ढूँढ़ना पड़ेगा और इसी संसार में ……!
संभव है, शायद तुम पता लगा सको
अपने अंतर्मन में उठे प्रश्नों के उत्तर को ?

हे पुत्र ……….?
सम्भव है कि संभवतः उठी होगी ऐसी जिज्ञासा पहले भी
पर…………………..? समाधान…………..?
किसी ने भी तो नहीं दी अब तक?

फिर भी,
अनुभव मैं अपना अवश्य बतलाऊंगा आज तुम्हें………………!

मनुष्य जो भी करता है, वह उसके अपने ही स्वभाव का प्रतिबिम्ब है ?
और स्वभाव ?
यह एक प्राकृतिक अवस्था का द्योतक है उस छण ?
परिस्थितियों का दास है मनुष्य, विवश है मनुष्य ?
मनुष्य अपना स्वामी नहीं कर्ता भी नहीं ?
है केवल है वह साधन मात्र …… साधन मात्र ?
फिर
क्या है सही ? है क्या गलत ?
कौन है दोस्त ? है कौन दुश्मन ?
कौन है अपना ? और कौन पराया ?
क्या है पाप ? क्या है पुण्य ?

हे पुत्र …………….!
मनुष्य अंततः सुख और केवल सुख चाहता है ?
पर उसके केंद्र अलग अलग हो सकते हैं ?
किसी को सुख धन में दीखता है, तो किसी को मदिरा में ?
? ? ? ? ? ?

किन्तु निर्विवाद है एक ही सत्य, प्रत्येक व्यक्ति चाहता तो है केवल सुख ही सुख ?
यही मनुष्य की मनः प्रवृति है उसकी दृष्टिकोण की विषमता।
और…….!
पाने की उसकी यह चाहत, उसकी तलाश ? है प्रबल कारण समस्त दुखों का………….?
और संभवतः उत्तर है तुम्हारे सभी प्रश्नों का……..?

और अंत में………………..?
हे पुत्र,
जीवन है हलचल और परिवर्तन ?
नहीं है कोई स्थान सुख और शांति का, इस हलचल तथा परिवर्तन में ?
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ललित निरंजन

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