अपूर्णता – जीवन का आधार

कभी सोचा है, क्यों ज़िंदा हो तुम
वो इसलिए की अब भी लापरवाह हो तुम

जो पूरी तरह सजग हो जाते
तो क्या भगवान ना बन जाते

जो पूर्ण हो जाओगे
तो मृत कहलाओगे
जो अपूर्णता होगी तुममे
तब तो जीने की वजह पाओगे

यदि कुछ कमी ही ना होगी
तो सारी उम्र क्या करोगे
जो तुममे खामी ही ना होगी
तो हर पल किसे सवांरोगे

अभाव है
इसलिए कर्म करते हो
पूर्णता की चाह में
रोज़ दो कदम बढ़ते हो

लालच है कुछ पाने का
आस है कुछ कर दिखाने का
जो सब सही हो जायेगा
तो जीवन अर्थहीन केहलाएगा

तू बुरे को भला बना सकता है
तू गलत को सही कर सकता है
तू अच्छे को बेहतर बना सकता है

यदि सब कुछ श्रेस्ठ बन जायेगा
तो फिर, तू क्या कर पायेगा
तेरा जीवन दिशाहीन बन जायेगा

चाहत तेरी अच्छा करने की है
क्युंकि बुरा है
चाहत तेरी बदलने की है
क्युंकि अब भी कुछ बचा है

उम्मीद ही तो सब कुछ है
दुनिया आस पर है कायम
कल आज से बेहतर होगा
इसी आशा पर टिका है सबका संयम

जो हो जाता सब कुछ लाजवाब
‘तो कोई ना देखता बेहतर बनने का ख्वाब
कोई दिशा ना दीखता जीवन की राह में
सब निकल पड़ते मौत की चाह में

जो तू चाहता है पूरी तरह जीना
तो ढूंढ अपनी अपूर्णता को
अपूर्ण को पूर्ण करने की लालसा में
छूयेगा जीवन की ऊंचाइयों को

अपने अंदर के सद्गुण को देख
मगर बस देख
अपने अंदर के दुर्गुण से सीख
और बहुत कुछ सीख

निश्चिन्त जीवन गलत नहीं
गलत है निराधार जीवन

हाँ तू ये जान ले के तू ज़िंदा है
क्युंकि तू अब भी लापरवाह है…!

6 Comments

  1. नवल पाल प्रभाकर नवल पाल प्रभाकर 13/11/2015
  2. नवल पाल प्रभाकर नवल पाल प्रभाकर 13/11/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 13/11/2015
  4. नवल पाल प्रभाकर नवल पाल प्रभाकर 13/11/2015
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/11/2015
  6. शकुंतला तरार 14/11/2015

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