“ प्रकर्ति की दस्तक “

हो प्रफुल्लित मेरा मन ,
देख धरा पर ये गूँज
वक़्त थम चला था दहशतगर्दो, मक्कारों के कपाट
बंद हो चले,
मानवता तड़प के त्रस्त यहाँ अब ,हार चुकी
आक्रान्ता का छिटपुट साम्राज्य था बचा यहाँ
नभ में उठने ही पड़ी बिजली की कौंध, रौंद
चली वह तिमिर को
ज्यूँ ही अकुलाये मेघों ने की अमृत वर्षा ,
कण कण भीगा सच्चाई की शीतलता से,
चल पड़ी सुधारकों की टूटी कलम,
दौड़ा, धूल फांकता ये बेबस अखबार
हो दृढ़ संकल्पित किया मानवता को प्रतिध्वनित, त्वरित
हो मानव कल्याण ,
प्रकृति की ये दस्तक है !!! अवचेतन भी साथ है,! स्वर्ण सदृश मस्तक है
ये सब देख मुझे अब अचरज है !!| ये सब देख मुझे अब अचरज है| | |