भूप बसंत

भूप बसंत

दूर-दूर तक हरे रूख
ओर तेज खिली वो धूप
मन को महकाए पवन
बसन्त आए बनकर भूप।
सिर पर पगड़ी पीले रंग की
मध्य में हरियाली छाई
पांव पड़ी मखमल की जूती
धरती ने ली है अंगड़ाई
ऐसे सुन्दर मौसम में
चंचल बनाया हवा ने रूप
मन को महकाए पवन
बसन्त आए बनकर भूप।
रूख अंजलि भर-भर
पत्ते बिखेर रहे झर-झर
हवा बह रही सर-सर
पत्ते उड़ रहे फर-फर
भागदौड़ की इस दुनिया में
देते हैं ये कितना सुख,
मन को महकाए पवन
बसन्त आए बनकर भूप।
-ः0ः-

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