आस्तित्व

निराशा के अद्भुत क्षणों में
महक रहे मन के अभाव
बोझिल हुआ पथिक
प्रकृति ने भी बदले हाव भाव,
शून्य यहां चंहुओर फैल रहा
हर कोई स्वयं को खोज रहा
अभिलाषा मनु तेरी
प्रकट करूं कौन शब्दों में
मैं शब्दों का अर्थ भूल रहा,
कल्पनाओं के प्रतिबिम्ब तले
खोज रहा प्रश्नचिन्ह
सूक्ष्म जल बूंद की शीतलता
करे सूर्य किरणों को छिन्न भिन्न,
चांदनी की कोमल भाषा
करे मार्ग तारों का विस्मित
शैवाल की परतें भी
कर देती कदमों को विचलित,
किस क्षण विलुप्त होगा
अनभिज्ञ परिभाषाओं के चिन्तन से
मनु विशालता का नेतृत्व
खोज रहा जो जीवन में
गूढ़ रहस्यों का आस्तित्व।

………………… कमल जोशी

One Response

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 12/11/2015

Leave a Reply