नन्हे बच्चे

नन्हे बच्चे

नन्हे बच्चे लिये कटोरा
मांग रहे थे भीख
मुझे याद है आज भी वो दिन
नही सका हूं जिसे मैं भूल ।
आज जिन प्यारे हाथों में
होनी थी कलम दवात
देख उन हाथों में कटोरा
आंखों से होने लगा अश्रुपात
कैसी है ये जिन्दगी
कैसी हैं मजबुरियां
आज इनकी मानव से
क्यों बढ़ गई हैं दूरियां
आखिर ये भी अमीर बाप की
मगर किसी हवस की षिकार
मां की होगी ये औलाद
आज भीख मांगते फिरते
ये भोले-भाले बच्चे अनाथ
ना तन पर कपड़ा
ना पैरों मेें जूती
चाहे हो कितनी ही गर्मी
चाहे हो कितनी ही सर्दी
ऐसी दषा देख निकलता
मेरे मुख से हाय !
कैसी बुरी है ये गरीबी
कैसे यहां से ये जाये।
-ः0ः-

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