प्रकृति का रूप

प्रकृति का रूप

कहीं पे फैली हरियाली
कहीं पे भूमि है वीरां,
कहीं पे फैली खुषहाली
कहीं पे मातम है मचा।
हरी-भरी भूमि को देख
मन मेें उठती है लहर
देख उजड़ती भूमि को
मन जाता है सिहर
नही सुनाता पहले की कहानी
नही पहले की है दास्तां,
कहीं पे फैली हरियाली
कहीं पे भूमि है वीरा।
प्रकृति को फलने-फुलने दो
हे प्रकृति के विनाषकों !
मत काटो प्यारे पेड़ो को
यारों बचाओ हरियाली को,
सुन लो धरती की पुकार
मत लो तुम इसका इम्तहां,
कहीं पे फैली हरियाली
कहीं पे भूमि है वीरां।
-ः0ः-

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