प्रकृति शौंदर्य

प्रकृति शौंदर्य

आलि ! पुष्पे मंडराये अलि,
नांचे पंख फैलाये कर कली।
बसंत आयो ले उमंग ।
हर्षोलाषित भयो ये जगत
ऐसे सुवाषित मौसम में
प्रिये नाहि मोरो एकि,
आलि ! पुष्पे मंडराये अलि।
भयो अजब सुहाना मौसम
लगाये तन में मोरे अग्न
ऋतु प्यारी जो मतवारी
उन बिन लागे फीकी सारी,
आलि ! पुष्पे मंडराये अलि।
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