जीवन और मृत्यु

जिस दिन मैने जन्म लिया
जिस दिन मैने जीवन पाया|
मृत्यु प्रेयशी ने भी हसकर
मुझे उसी दिन से अपनाया||

मेरी आयुष की माला मे
स्वासो के सुंदर से मोती
जीवन देता रहा नियति
हँस हंसकर उनको रही पिरोती||

किन्तु मृत्यु ने साथ-साथ ही
लेकर उन्हे मसल डाला है|
स्वासो की जो मिली धरोहर
उसने उसे कुचल डाला है||

मेरी द्वार देहरी पर ही
दोनो का व्यवहार रहा है|
पल-पल मे लेने-देने का
दोनो मे व्यापार रहा है||

जीवन और मृत्यु दोनो कब
होकर अलग-अलग चलते है|
दोनो मेरे साथ-साथ है
दोनो साथ-साथ पलते है||

इसीलिए तो मुझे मृत्यु से
सच मानो कोई द्रोह नही है
और सत्य यह भी है मुझको
जीवन से कुछ मोह नही है||

One Response

  1. नवल पाल प्रभाकर नवल पाल प्रभाकर 10/11/2015

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