सोच

सोचती है सोच
झील की गहराईयों सी
मगर आसमां की परछाईयों में
मिलते हैं
कुछ ही बादल पानी के
बिखर जाते हैं तो
रह जाते हैं निशां नाकामी के,
रातों को बंधती है
प्यार की जो कशिश
सूरज की रोशनी से
सुबह सवेरे
अंगारों सी झुलस जाती है
सर्द बर्फ भी
जख्म हथेली पे दे जाती है,
आसमां में चांद कहां
उड़ते बादलों का डेरा है
चांदनी भी उसकी
काले बादलों में बिखर जाती है
और हर सोच
इस जमीं पे ठहर जाती है।

………………… कमल जोशी

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