बिखरे मोती

समेटूं उन मोतियों को कैसे
बिखर गये जो वक्त के साथ
दूर दूर तक बैचेनी का आलम है
मजबूरियों ने जकड़े हैं मेरे हाथ
भुला नहीं पाया हूं तुमको
मेरी आंखों में हैं तुम्हारे आंसू
मेरे करीब आकर तो देखो
होंठों पर हैं तुम्हारी ही बातें
याद है मुझे वह आलम
तुझपे नहीं मुझपे था सितम
दिखाते थे जो मुझे आईना
आज उन्हें आईने की जरूरत है
उनकी किस्मत कल तक हसीं थी
आज उनपे हम हंसते हैं
जिन्होनें हमें कांटे चुभोये थे
हमने उनका खंजर बना डाला
यह मेरे जख्मों पे मरहम नहीं
ये निशां तेरी याद दिलायेंगे
सोचता हूं तेरे बारे में
पर अब न चाहूंगा तुम्हें
सारी तमन्नाओं का कत्ल कर डालूंगा
आज मेरा मन खुश है
क्यो? कोई नहीं जानता
पर इकसा जवाब है मेरे पास
गुनाह में भी गुनाह किये
तेरी खातिर आग पर वार किये
तू तो अनजान है
और आज मैं वीरान हूं
कोई नहीं मेरे पास है
तोड़ा शायद किसी का विश्वास है
कोशिश करूंगा फिर से
बिखरे मोतियों को समेटने की
अंतहीत सागर में उन्हें तलाशने की।

………………… कमल जोशी

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