परछाई

अजनबी ख्यालों में
सिर्फ तेरा साथ है
दूर-दूर तक तन्हाई है
संग अपने एक परछाई है
आसमां भी अब खुला नहीं
घुंघ का उसमें परदा है
बादल नहीं ये बरसात के
हैं यह सिर्फ गरज के साथ के
सूरज तो दिखाता है आईना
पर घूप का नहीं यह शहर है
हर कली मुरझा जाती है
चलता यहां अपनों का कहर है
रात तो एक तन्हाई है
पर चांदनी का आंचल ओढ़े
संग मेरे तेरी परछाई है
यों ख्वाबों में आती हो क्यों
हर सुबह तो तेरी रूसवाई है।

………………… कमल जोशी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 08/11/2015
  2. K K JOSHI K K JOSHI 08/11/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/11/2015

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