कहा हु मै —————

हताशा भरा है माहोल, ना कोई लक्ष किसीका
लगता है बस जी रहा, न कोई अर्थ जिंदगीका

कितने सालोसे गुमसुम, आवाज हर किसीका
कैसे ले जाये देश आगे, मिल न पाया तरीका

रोज टी व्ही पर झगडा, बहसमे दिल किसीका
इसने ये किया उसने, वो मन न शांत किसीका

गरीबी भी है अशांती भी, कोई न सहारा किसीका
कहा पोहोची है दुनिया, हमे सिर्फ गर्व खुदिका

इस सदिमे भी न पाया, पुरा हो सपना किसीका
देशकी सिर्फ बाते, किसीसे न रिश्ता किसीका

चल रहा लंगडाकर यु, न कोई मुकाम किसीका
बढ जाये जमाने ये आगे, न कोई अरमान किसीका
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शशिकांत शांडीले (SD), नागपूर
मो.९९७५९९५४५०
दि. ०६/११/२०१५

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/11/2015
  2. शशिकांत शांडिले SD 09/11/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/11/2015

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