* क्या यही है विकाश *

क्या यही है विकाश !
धुंधला प्रकाश जिस से
समझ न आये दिन या रात
संध्या हुई या प्रभात
तो हमें नहीं चहिए ,

बच्चा-बच्ची एक सामान
दोनों बढे तो बने देश महान
जब उन्हें समझ न आए
अपनी सभ्यता-संस्कृति
तो हमें नहीं चाहिए ,

नर-नारी की बारी छोड़ो
महाविधालय की यारी छोड़ो
स्कुल के विधार्थी भी जब
लगे पार्क में बैठने छाता तान
तो हमें नहीं चाहिए ,

यह कैसी दोस्ती या नाता
जिसे अपनी रिस्ता भी
समझ में न हो आता
जो सभी को बताए धत्ता
तो हमें नहीं चाहिए ,

क्या यही है विकाश !
तो हमें नहीं चाहिए।

Leave a Reply