* विकाश *

सोचो लोगो का कैसा विकाश हो रहा
मानवता के पतन का दरवाजा खुल रहा ,

प्राकृति संतुलन को लोग ही मिटा रहा
सारी दृश्यों को चार दिवारी में ला रहा ,

विकाश का गजब परिभाषा हो रहा
अभिव्यक्ति और आन्नद पर तमासा हो रहा ,

चुम्बन-आलिंगन का प्रदर्शनी हो रहा
सच्चे रिश्ते नाते कही गुम हो रहा ,

बेटा बाप को ताना है मार रहा
गजब की दृष्टि से लोगो को निहार रहा ,

भाव अभिव्यक्ति का रंग बदल रहा
खाने-पिने , पहनने-ओढ़ने का ढंग बदल रहा ,

लोगो का गजब भाव हो रहा
बाजार वाद का रिश्ते पर प्रभाव हो रहा ,

इन्सानियत मशीनियत के रंग में रंग रहा
संस्कार-संस्कृति पर सोचने का वक्त अब न रहा ,

वस्तु वाद का बोलबाला हो रहा
सभी का हिरदय काला हो रहा ,

सोचो लोगो का कैसा विकाश हो रहा
सभ्यता संस्कृति संस्कारो का नाश हो रहा।

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 07/11/2015
  2. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 07/11/2015
  3. अंकित 07/11/2015
  4. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 07/11/2015

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