कर भाग्य से हाथ चार

kar bhagya se

यूं चूक मत तू बार-बार
कर शर-संधान फिर एक बार,
भेद दे तू मत्स्य आंख
यूं अवसर मुख तू अब ना ताक ।
बीता समय, हंस हुआ काग
रीता विजन अब तू ना भाग
मानस पर अंकित शंकाओं को
अब तो तू त्याग, अब तो तू त्याग ।
तेरी सहजतओं को डस गया शंशय का नाग
गहरी तामसिकताओं को कर भस्म तू लगा आग,
स्वप्न देख ना अब मात्र तू त्याग चिर निंद्रा
अब तो तू जाग अब तो तू जाग ।
किस पल का है तुझे इंतज़ार?
फिर उठ खड़ा हो अबकि बार
भर हुंकार, कर प्रचंड वार
कर भाग्य से अब हाथ चार!

-जनवरी 2013

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 07/11/2015
    • pt utkarsh shukla 07/11/2015
      • Kumar Prashant Kumar Prashant 07/11/2015
    • Kumar Prashant Kumar Prashant 07/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/11/2015
    • Kumar Prashant Kumar Prashant 07/11/2015

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