दीपक की आपबीती

एक रात मेरे सपने में मिटटी का दीपक आया और उसकी मन की दांस्ता मैं मनमौजी आपके सामने रख रहा हूँ दिल पर लगे तो आप का आशिर्वाद चाहता हूँ

अंधेरो में उजालो की परिभाषा कहलाता हूँ
दीपक हूँ अदना सा मैं , आज दिल की कुछ बतलाता हूँ।

जलता हूँ मगर फक्र से, अँधेरे को मार गिराता हूँ ।
अमावस की रात दिवाली को , हर चेहरे पर जगमगाता हूँ ।

तेरी इस रंगीन रौशनियों में , खामोश कही मैं रोता हूँ
रोता नही मैं खुद के लिए, उस गरीब का दुखड़ा रोता हूँ

तू कुलदीपक हैं तेरे घर का , बता तू जब बुझ जाएगा
क्या होगा तेरे परिवार का , जब सबकुछ लूट जाएगा ।

अरे नासमझ , इन रंगबिरंगी रोशनियों से हम मिट जाए इसका कोई हर्ज नही
जो हमसे जिन्दा हैं उनके घर अँधेरा रहे ऐसे हम खुदगर्ज नही

मत कर अँधेरा उनके घरो में , वो भी तेरे अपने हैं ।
उनके भी हैं बूढ़े बच्चे , उनके भी कुछ सपने हैं ।

जाग मनमौजी जाकर तू हम दीयो को अपना दे
उन मायूस आँखों को खुशियो का सपना दे ।

उनके अंधेरो में उजाला बन तुम्हे दीपक बनना होगा ।
औरों को भी साथ में लेकर इस पथ पर चलना होगा ।

तभी मनेगी ये दिवाली हंसी ख़ुशी उल्लास से ।
जगमग होगी पावन धरती प्रेम स्वरूप प्रकाश से।
जगमग होगी पावन धरती प्रेम स्वरूप प्रकाश से।
अंशुल पोरवाल
मनमौजी

3 Comments

  1. नवल पाल प्रभाकर नवल पाल प्रभाकर 06/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/11/2015
  3. Anshul Anshul 06/11/2015

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