“भूखा बालक “

“आज नया जीवन देखा है
मिटते हुए कहीं बचपन देखा है
आस्था के उस मंदिर में
जीने का नया कलेवर देखा है ,

धूल-धूसरित कपड़ों में
फटे- चिथड़े अन्तःवस्त्रो में
उम्मीद लिए वह आँखों में
थम कटोरे को हाथों में ,

मांग रहा वह पैसे दो-चार
ताकि हो जाये रोटी का जुगाड़
क्षुधा को आज तड़पते देखा है
बचपन को फिर लूटते देखा है ,

ना चाहू मै मंदिर-मस्जिद
ना मानु मै हिन्दू-मुस्लिम
भूखा पेट यहाँ हमको
सिखलाता है जीवन की तालीम,

ना जानु मै विकास की बाते
ना चाहू मै जगमग राते
बस चाहू एक छप्पर सर पे
ऐसे हम उम्मीद लगाते,

आसानी से मिले दो वक़्त की रोटी
और मिले शिक्षा का अधिकार
बस इतना सा सपना है अपना
और यही है जीवन हमारा ||”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/11/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 06/11/2015

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