दो का चक्कर

दो का चक्कर
जब वक़्त चले कुछ हटकर
और शनि दृष्टि हो वक्र
तो चलता है दो का चक्कर

दो का फेर
हो उजाला, पर दिखे अंधेर
सोती किस्मत को जागने में हो देर
ये होता है दो का फेर

दो का नंबर
प्रेम बाहर , ईर्ष्या अंदर
दुःख के पहाड़ , गमो का समुन्दर
तब मिलता है दो का नंबर

दो के मारे
हैं विरले वो बेचारे
टूटे किस्मत के सितारे
खुद ही हैं दो के मारे

दो का क्या कहना
जब प्रेमिका बने बहना
बेइज्जती का दर्द पड़े सहना
ऐसे दो का क्या कहना

दो का दर्द
जब कोई न हो हमदर्द
मिले सब खुदगर्ज
तब होता है दो का दर्द

दो की गिनती
जब कोई न सुने विनती
विस्वास की जगह धोखे से छिनती
तब नहीं भाती दो की गिनती

दो की सीख
निभाओ खुशामद की रीत
ह्रदय नफरत ,दिखाओ प्रीत
मिलेगी जीत, ये है दो की सीख

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/11/2015

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