शून्यता

आज मेरे हृदय में शून्यता
पांव पसारे बैठी है
मन मस्तिष्क में भी
विचारों की अठखेलियां थम गई है
मेरे जीवन का रस
तपती गरमी में
फूल पत्तों सा सूख गया है
सूरज की तपिश का एहसास है
लेकिन
धूप का मतलब भूल गया हूं मैं
रात को जो चांद
चांदनी में नहाया करता था
आज उसमें दाग दिखा करता है
सपने जो बचपन में
जीवन में आकांक्षाऐं जगाते थे
आज उनमें जीवन का नाम नहीं है
जीवन ने भी करवट बदली है
धरती फिर से
आग का गोला बनी है
तपिश से उसकी बर्फ पिधल गई
मेरी सारी तमन्नाऐं जल गई
सारी अपेक्षाऐं
कहीं दूर पत्थरों में सिल गई
यह काया आज जिन्दा लाश बन गई।

………………… कमल जोशी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/11/2015
    • K K JOSHI K K JOSHI 06/11/2015

Leave a Reply