अंतहीन तलाश

मैंने अपने हृदय में
तिनके का एक घर बनाया
जिसके हर कोने में
मैंने सिर्फ तुम्ही को पाया
कभी सुमन की तरह तुम मुस्कुरायी
कभी खूशबू की तरह
तुम चारों ओर महकी
कभी चमकी
ओंस की बूंद की तरह
तो कभी रंग की तरह
तुम निखरी
मैंने कई बार अपने होठों से
तुम्हें स्पर्श करना चाहा
बादलों के उस पार तक
तुम्हें तलाशना चाहा
तुम्हें अपने हृदय में सजाया
जीवन के हर कोने में बसाया
सोचा तुम्हें मैंने करीब से
राह से भटके राही की तरह
तुममे मैंने अपना रास्ता खोजा
तुम्हारे हाथों की लकीरों में
तुम्हारे माथे की रेखाओं में
आंखों की गहराईयों में
खोकर अपने सभी सवालों का
मैंने जवाब जानना चाहा
जिनकी तलाश में
मैं चलते-चलते
नदी के उस पार से
न जाने कहां आ पंहुचा हूं
जहां न तो रात का सन्नाटा है
और न ही दिन का उजाला है
न यह नदी है न सागर है
न पहाड़ है न मरूस्थल
जिसका कोई अन्त नहीं है
कहीं अन्त नहीं है।

………………… कमल जोशी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/11/2015
    • K K JOSHI K K JOSHI 06/11/2015

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