काल चक्र में

काल चक्र में

मेरा अतीत
मेरा भविष्य
मेरा वर्तमान
सभी गुम हैं
काल चक्र में
ये पहिया
रफ्तार पकड़
बेड़ियों से
मुझे जकड़
बिलो देता
अंजर-पंजर
घसीट रहा
कुछ ऐसे मुझको
चोट देता है।
थपकी भर
इसी चोट से
ना ऊबर
सका मैं
काया करने
लगी है
थर-थर
घुटन-सी
जीवन मूल्यों से
घुटन सी
हर इक पहलू से
घुटन मुझे
स्ंसार से
घुटन हर इक
शख्श से
घुटन है
सच्चे प्यार से
धोखा ही धोखा
मिला
इस पापी
संसार से
फिर क्यों
मैं पूंजूं
उस ईष्वर को
घृणा उस
पालनहार से ।

-ः0ः-
प्रेमांकुर

मन के अन्दर
बीज बो गये
वो हमें छोड़
कहीं ओर चले गये
मन के अन्दर
फुटी कोंपल
खिले-पत्ते
गदराई कोंपल
देकर प्रेमाधार
सींची, सहारा
देकर कोंपल
एक दिन पूरा
वृक्ष बन वह
लहलहाने लगा
गद्गद भरे
प्रेमताल में
बिखेर जड़ों को
नहाने लगी
तुमने इसको
पाला-पोषा
बज्र से
हृदय को मेरे
मोम के माफिक
पिघंलाने लगी
चारों तरफ
सन्नाटा था
मगर अब
सन्नाटे को
तोड़ने वाली
कलरव ध्वनि
चारों तरफ से
आने है लगी
इस ध्वनि से
प्रसन्न मैं
ओर पुलकित
मेरा तन
आंखों की बढती चमक
शायद ज्यादा
दिन तुमको
ओर अच्छी ना लगी
इसलिए तुम छोड़ मुझे
दूर-दूर यूं जाने लगे
भरा-पूरा ये पेड़ मेरा
मन के अन्दर
टूट-फुट कर
फिर से ये
कुभलाने लगा
सूख-सूख कर
पत्ते गिरे
पेड़ ये खाली
ठूंठ हुआ
ठूंठ पेड़ पर
अब तो देखो
कौवा तक ना
बोलता है।
जहां कोयलें
कूंकती थी
सब वीरां-सा
लगता हैं।
-ः0ः-