हमारी औकात

हमारी औकात

एक आदमी से बनता परिवार
परिवार से फिर बनता घर
कई घरों से बनता गांव।
गांव जन्म देता शहरों को
शहरों से बनता है देष
देशों से बनता है संसार
संसार बसा पूरी पृथ्वी पर
पृथ्वी लटकी अधर कण बन
पृथ्वी जैसी जाने कितनी
ओर पृथ्वी ब्रह्माण्ड में
हरेक पर बसता उजड़ता जीवन
हर कण टूटता-फूटता
नए कण को जन्म देता
फिर हे मानव! हमारी तो
इस धरा पर बिसात है क्या
कौन रहा है कौन रहेगा।
तिनके जैसी हस्ती हमारी
हम बैठें बारूद के ढेर पर
न जाने कब आग भड़क जाए
ओर हमारा नश्वर शरीर
उसके दहकते शोंलों में
जलकर खाक हो जाए
इसलिए सारे गलत काम छोड़
उस परमात्मा में लीन होकर
याद हमेषा रखा जाये।

-ः0ः-

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