साफ निर्जीव आकाश

साफ निर्जीव आकाश

आज जब मैंने
आकाष को देखा
तो वह एकदम
चारों ओर से
साफ ही साफ था।
सुबह-सुबह ही मैंने
उसे देखा था
सारी जगती की
सभी क्रियायें
हर दिन की ही भांति,
सुचारू रूप से
चल रही थी।
पक्षी अपने घोंसले छोड़
निकल पडे़ थे
दिन भर के सफर के लिए
मौसम एकदम साफ था,
जो आंधियों के कारण
आकाष में चढी थी धूल
वो बारिष के बादलों ने
अपनी बूंदों से धो दी।
सो उस खाली आसमान में
उड़ते हुए परिन्दे
अपनी अलग ही
शोभा दर्षा रहे थे
नीले कांच से पारदर्षी
गहरे आसमान में
नजरों से ओझल होने की
ऊंचाईयों तक
आसमान में उड़ते बादलों के
जल से प्यास बुझाने वाले
उस छोर तक जाने वाले
वो सारे के सारे पक्षी
रंग-बिरंगे रंगों वाले
इस सूने खाली से
निर्जीव आसमान में
प्राणों का संचार हैं करते
गूंगेपन की हद तोड़ते
इसके गले को सूर से भरते
महकते-बहकते किलकारी करते
कुल मिलाकर चारों तरफ से
खाली निर्जीव से
इस पूरे आसमान को
किसी भी तरह से
बोर नही होने देते
प्रकृति के अद्भुत निराले
सभी रंगो के प्यारे-प्यारे
आसमान के साथ किलोल करते
धरती के हैं राजदुलारे
मदमस्त से प्यारे-प्यारे।
ये सुन्दर पक्षी मतवारे।
-ः0ः-
हिन्दी की पुकार।

कभी तो मैं खुद भी
इतनी सुन्दर हुआ करती थी।
हर शख्श चाहता था मुझको
सभी अदाएं भाया करती थी।
मर मिटा हर कोई मुझ पर
मेरे यौवन रूपी यज्ञ में
प्राणों की आहूति दे दी ।
मेरी उस समय पर देखो
छवि निराली हुआ करती थी ।
हर शख्श चाहता था मुझको
सभी अदाएं भाया करती थी।
कहने को तो आज भी मैं
बड़ी हूं, बड़ी का दर्जा मिला
भूल गये वो राहें जो मुझसे मिला करती थी,
आज फिर वही हो रहा
जिससे कभी मैं घृणा करती थी।
हर शख्श चाहता था मुझको
सभी अदाएं भाया करती थी।
-ः0ः-

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