बीती बातें

बीती बातें

आज जब मैं
अपने पुराने दिनों की
यादें ताजा करने को
स्कूल की चाहरदीवारी
के अन्दर जब दाखिल हुआ
तो दंग मैं रह गया
यकायक ……..आंखें
चूंद गई
मुझे पल को तो
ऐसा लगा कि…..
मैं किसी ओर जगह आ गया
क्योंकि ……………
मैंने जहां षिक्षा ली थी
वो ओर स्कूल था।
भले ही गेट वो पुराना था
मगर स्कूल अन्दर से
बदल चुका था।
न वो विज्ञान कक्ष था
न वो पानी की टंकी थी
न वो षिक्षा थी
न वो षिक्षार्थी थे
न वो षिक्षक थे ।
न वो चपरासी था।
वहां थी तो बस
वही शहरी आबो-हवा
मैदान भी बस तिल-भर
षिक्षक कठपुतली फैषन की
ढाल तन को फैषन में अपने
षिक्षा देते युग प्राचीन की
याद दिलाते गांधी का भाषण
पहनों सूती कात के वस्त्र
धारण करो तुम तन पे खादी
गांधी ने बहिष्कार किया
इन नये-नये कपड़ों का
जला दी थी इनकी होली
पर वो षिक्षक ये नही जानते
क्या वो बलिदान था ?
जब हम बच्चों का जन्म हुआ
स्वतंत्र देष का हर बच्चा
अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र था
खेलने का बढ़ने का
अग्रसर अपने पथ पर होने का
हर किसी का हक है।
पढो, बढो तरक्की करो
ओर दुनिया पर छा जाओ
मगर दुनिया की कालिमा को
अपने दिलों पे मत छाने दो
सीखो कुछ दूसरों से
उनकी गंदगी, अधूरा फैषन
दिनचर्या में न आने दो।
-ः0ः-

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