इंसान

इंसान

मुट्ठी भर खुषियांे की खातिर
छटपटाता इंसान
अरमानों के आईनों में
बालू से घर बनाता इंसान।
यह वह नही जानता।
कि……………………………
उसका यह घर
ढह जाएगा एक दिन
बिखर जाएंगे इसके हर कण
हो जाएगा एक दिन चूर
ये खुषियां होती हैं थोड़ी
इकट्ठा करता है जिन्हें वह चुन
ये वो कलियां हैं जो एक दिन
मुरझा जाएंगी।
ये वो स्वप्निले स्वप्न है।
जो जायेंगे एक दिन धुल
खुषी से अच्छा तो दुख है
हमेशा साथ रहता है जो
ये वो कलियां ओर
स्वप्निले स्वप्न नही
ये वो कंटीले सूखे कांटे
ओर तेज धार तलवार है।
जिन पर हमेषा चलना है।
-ः0ः-

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