पतझड़ ऋतु

पतझड़ ऋतु
आज बयार शीतल होकर
चलने लगी है मंद-मंद
सूखे पात बजते हैं ऐसे
जैसे बजते हों मृदंग।
पतों की हंसी ठिठोलियां
घुमना-फिरना हर नगर
आना जाना हर गलियां
बागों में खिलने लगी हैं कलियां
थी कभी जो बंद-बंद,
आज बयार शीतल होकर
चलने लगी है मंद-मंद।
पतों की इस सरसराहट ने
मन धड़काया, कंपित किया तन
सरदी की बर्फिली हवा में
गुनगुनाने लगी हैं कलियां
अपनी पलकें मुंद-मुंद,
आज बयार शीतल होकर
चलने लगी है मंद-मंद।
-ः0ः-

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