सांसों की बेल

सांसों की बेल

सांसों की बेल
कड़-कड़ कर
टूटने लगी है
जंग लग कर
पर तुम्हारी
यादों का मंजर
याद आता है
थम-थम कर ।
आंखों में छाई
अजीब-सी उदासी
तुम आती तो
चमक आ जाती
तुम्हें देखने की
आष अब बस
इस मन में
आज समाई है।
बिजली कौंधती है
तड़-तड़ कर
सांसों की बेल
कड़-कड़ कर।
-ः0ः-

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