मिट्टी

मिट्टी

मिट्टी तु तो मिट्टी है
फिर तेरी क्या हस्ती है
ठोकर लगे तु उड़ जाये
पानी गिरे तो बह चले
बिन मेरे तु बंजर लगे
दिखने में आंखों को ना भाये
रहती उजड़ी इसी तरह तु
धूली बन तु उड़ जाये ।
फिर देख मेरी क्या हस्ती है
मैं ज्यादा तुझसे सुन्दर हूं
हर जगह मुझसे पूजित है
मुझसे तेरा वजूद है
मेरे होने से ही मिट्टी
तु जगती में सुन्दर है
अचानक पास खड़ा बरगद
झूका, हिला-चरमराया-
फिर उसने घास को समझाया
घास तेरा वजूद है क्या ?
मिट्टी सहनशील होने पर भी
ठोकर लगने पर यह
चढ़ सिर पर ये जाती है।
फिर भी मिट्टी, मिट्टी ही तो है
पानी में बहना,
हवा में उड़ना,
ये इसका स्वभाव है
बंजर हो कर भी
इसका अपना इतिहास है।
यह सुन घास लज्जित हुई
ओर समझ बड़प्पन मिट्टी का
वह पश्चाताप करने लगी।
-ः0ः-

Leave a Reply