हम बदले नहीं…

हम बदले नहीं…

“क्या हुआ मुझे, समझ नहीं आता,
कुछ रंग ज़िन्दगी में घुलने लगा है,
सपनों में भी जो एहसास नहीं हो सका,
ऐसी ही राहों में दिल मुड़ने लगा है,
ये कौन अजनबी है जो आज मेरी आँखों से,
बेवक़्त आकर लूका छिपी करता है,
शायद़ ये वही है जिसकी चाह थी मुझे,
इसलिए उस ओर पाँव चलने लगा है।“
– सुहानता ‘शिकन ‘

आज भी लोगों से मिलता हूँ वो कहते हम बदले नहीं,
आईने में खुद को देखा तो हम पहचान सके नहीं।

अभी-भी गुजरता उन्हीं राहों से,
पहले मैं जिनसे गुजरता था,
थमे हुए थे रस्ते सारे,
परछाई साथ में चलता था,
लेकिन रस्ते चलते लगे अब, परछाई लगे चले नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।1।

आज भी मैं पूरी जिन्दादिली में,
बात सभी से करता हूँ,
अल्फ़ाजों के फूलझड़ियों से,
खूब लतीफें कसता हूँ,
पर क्यूँ ये अब महसूस करूँ कुछ लफ़्ज लब़ों से निकले नहीं.
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।2।

कल तो ये पलकें परिन्दों जैसी,
उड़-उड़ जाया करती थीं,
पल में यहाँ तो पल में वहाँ है,
एक जगह नहीं रूकती थी,
लेकिन आज क्यूँ इसी नज़र को उनके सिवा कोई जचे नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।3।
– सुहानता ‘शिकन‘

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