दुर्दशा

माता कहकर तुमको देखो लूट रहे तन बदन तुम्हारे
कैसे तेरे दूध की देखो इन लोगों ने कर्ज उतारे ।

इनका तो उत्थान हो रहा , देश गर्त में जाता
इनके घर में चकाचौंध है बाकी पड़े अंध गलियारे ।

कागज में बह रही नहर से कृषक लाभ उठाता है
दफतर के फाईल में ऐसी कई नहर बहती है प्यारे ।

कागज में नित नई योजना बनती और सँवरती है
ताकि अपनी जेब सँवर ले, जनता जाए भाड़ में सारे ।

राज कुमार गुप्ता – “राज“

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/11/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 02/11/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/11/2015
  3. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 02/11/2015
  4. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 03/11/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 03/11/2015

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