“डॉ. पंकज सर को समर्पित” डॉ. मोबीन ख़ान

कल तक जहां थे आप आफ़ताब बनकर।
अब तो वहां पर रोशनी कम लगे।।

ना जाने कितने चिराग़ एक साथ मिलकर जल रहे।
फिर भी ये आफ़ताब से ना लगे।।

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  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 01/11/2015

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