क़यामत की ओर

धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर
जिंदगी की राहों पर घिर आई हैं अब घटायें घनघोर

दर्द सहने की आदत अब पुरानी हो गयी है
मौत की ओर जाने वाली राहें अब सुहानी हो गयी है
अब तो टूटने लगी है हर रिश्ते की डोर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

जो रह गया हासिल करने में, अब उसका गम नहीं
और जो हासिल कर लिया, वो किसी से कम नहीं
अब तो थम सा गया है हसीं महफ़िलों का दौर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

आखें मूंदे बैठा हूँ , आत्म मंथन की बेला है
भूल गया था कि य दुनिया अंतहीन सपनो का मेला है
हौंसला मजबूत मगर सांसे हो रही हैं कमजोर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

दुनिया देखी ,रिश्ते देखे और देखा अपनों का रवैया
रिश्ते नाते सब झूठे यहाँ -सबसे पयारा रुपया
धन दौलत से पयार यहाँ , झूठा अपनेपन का शोर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

सूखे आंसू ,बिखरे सपने और टूटी अरमानों की डोली
दस्तूर यहाँ का , दिल में विष और मीठी होती है बोली
लेकिन मेरे लिए सब बराबर चाहे संध्या हो या भोर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

मैं खुदगर्ज नहीं , मुझे दुनिया की बेरुखी ने मारा
जिंदगी की डूबती नैया को अब मिलेगा किनारा
लगता है कि भटकते दिल को अब मिलेगा ठौर
धीरे धीरे बढ़ चला हूँ अब क़यामत की ओर

हितेश कुमार शर्मा

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/10/2015
  3. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 30/10/2015

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