“गाय और बकरी की मुलाकात “

“चारागाह में हुयी मुलाकात
गाय और बकरी की
कर प्रणाम एक दूजे को
फिर पूछ लिया कुशल क्षेम
वार्तालाप की कड़ी में
बकरी प्रथम बतलाती है ,

तंग हुयी इस जीवन से
हर पल डर के अब जीती हु
पूर्व जन्म के पापो वाले
इस जीवन को मै जीती हु

करती हु फिर प्रार्थ प्रतिदिन
अपने उस परमेश्वर से
बढ़ रहा है आतंक पाप का
आज पुनः इस पृथ्वी पे

थी पृथ्वी जो अप्रतिमं कृति उस ईश्वर की
बन गयी है आज दुनिया आतंक की
बेबश,निर्दोष हम सब जन
अकारण ही यहाँ काटे जाते है ,

क्या कमी हो गयी खाद्यान्नों की
जो अब जानवर ही खाए जाते है

जानवर हमें जो कहते है
क्या नाम उनका अब रखा जाये
खाते है काट हमें जो
उनको भी जानवर ही कहा जाये ,

खुद के जीवन का पता नहीं
फिर बच्चो की खैर मनाऊँ कैसे
कर पैदा उन्हें पछताती हु अब
यह फिर उन्हें बताऊँ कैसे ,

होते यदि तुम जैसे सिंग
तो खुद की रक्षा भी करती
दे पटकनी दो-चार इन्हे मै
औकात बतलाती थी इनकी ,

सखी होंगे हाल तुम्हारे अच्छे
सर्वश्रेठ जो तुम मानी जाती हो
मिलता है सम्मान तुम्हे माँ का
इनके द्वारा तुम पूजी जाती हो ,

हाल नहीं तुमसे अलग मेरा
आके धरती पे मै भी पछताती हु
हो आशंकित जीवन के प्रति
ईश्वर से खैर मनाती हु ,

कैसी माता,किसकी माता
क्या कभी माता काटी जाती है
चंद पैसो पे करके सौदा
कसाईयों को बेचीं जाती है ,

होते हुए सर पे सिंग
बेबश स्वयं हो जाती हु
कर आर्तनाद उस ईश्वर से
प्रार्थ में उसके खो जाती हु ,

अपने जीवन की दुर्दशा पे
हो व्यथित दोनों रो पड़ती है
कर विचारों का आदान-प्रदान
पथ पे अपने फिर दोनों चल पड़ती है ||”