पापा कहाँ खो जाते हो(शिवदत्त श्रोत्रिय)

शाम को ऑफीस से जब भी तुम घर आते हो,
सबसे पहले आकर के TV का बटन दबाते हो|
रिमोट उठाकर के मनपसंद channel लगते हो,
फिर चलचित्र की दुनिया मैं पापा कहाँ खो जाते हो||

ना जाने की फोन पर क्या-2 type करते रहते हो,
कभी-2 तो खुद से भी कुछ बाते करते रहते हो|
लगता है सबसे ज़्यादा phone आपको प्यारा है,
ऐसा लगने लगता है, जैसे झूठा साथ हमारा है||

मैं सुबह से शाम तक आप के इंतजार मैं रहता हूँ,
बातें आपसे करता हूँ, अपने मित्रो से कहता हूँ|
थके हारे जब भी पापा, ऑफीस से घर आते है,
भूल के सारी काम की चिंता, मुझको गले लगाते है||

मैं बोलू या चुप रहूं, पापा सब समझ जाते है
मेरी हर इच्छा को बिन बोले पूरी कर जाते हैं||

शायद मैं छोटा हूँ बहुत, आपकी मजबूरी को जानता नही
आपकी व्यस्तता के प्रति, ज़िम्मेदारी को पहचानता नही||
पर मेरा भी तो कुछ हक है, आपके साथ समय बिताने का|
माँ को गले लगाने का,फिर संसार को भूल जाने का||

माना मोबाइल आपको बहुत प्यारा है, पर थोड़ा सा हक तो हमारा है
मोबाइल जितना अगर हो ना सके,TV जितना ही प्यार करो|
Office से घर आते ही, मुझको भी बाहों मे भरो|
सारी दुनिया के रिस्ते निभाते हो, बेटा बहुत याद आते हो
पापा, ऐसा कभी मुझसे भी कहो ||

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/10/2015
  3. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 21/04/2016

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