ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा ।

ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा।

क़द्र उसकी क्यों करें हम जिंदगी से जो है हारा ।
चल रहे है ठोकरों पर आज हम भी बेसहारा ।।

हारने का ये तो मतलब हैं नही क़ि टूट जाओ ।
टूटने के दर्द का तुम कुछ करो एहसास प्यारा ।

मिल सकेगी न कभी मंजिल उसे तुम मान लेना ।
जो निकल दरिया से भागा बुझदिलो सा कर किनारा ।।

उम्र भर जिसने न समझा उम्र की तरकीबिया को ।
उम्र ढल जायेगी उसकी क्या करेगा बन बेचारा ।।

ख़्वाब सपने जो सजायें चल उसे कर दे हक़ीक़त ।
वक़्त गुजरा न मिलेगा कल न लौटेगा दुबारा ।।

सोचने की उम्र तो अब है नही मेरे दोस्त रकमिश” ।
कब उड़ोगे हौसलों के पंख का लेकर सहारा ।।

—R.K.MISHRA

5 Comments

  1. Ashita Parida Ashita Parida 28/10/2015
  2. Uttam Uttam 29/10/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/10/2015
  4. राम केश मिश्र राम केश मिश्र "राम" 30/10/2015
  5. sushil sushil 30/10/2015

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