परिवर्तन

झुकी कमर को लाठी का सहारा , जरा सी जरा का है ये नजारा ………..

ऑंखें बोझिल , चेहरा उदास ;
सूखे होठ , लरजती आवाज़ |
कपकपाते हाथ , और फूलता दम ;
लड़खड़ाते क़दम, और टूटता बदन |

लेकिन ……

सपनीली आँखें औ गालों पे लाली ,
गुलाबी अधर ज्यों शराब की प्याली |
बोली पे उसके थी कोयल लजाती ,
और ….
बनठन के जब वो निकली शहर में ,
रांझों के दिल पे चल जाती दराती |

वो भी समय था,
ये भी समय है |
तब जोश से जीत थी ,
अब निराशा से भय है |
जतन चाहे जितना तू कर ले पथिक ,
ज्व़ार जब भी है आया ,
तो भाटा आना भी तय है ……

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/10/2015
  2. sushil sushil 28/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/10/2015

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