ग़ज़ल.मुझे भी डर नही लगता.

ग़ज़ल .मुझे भी डर नही लगता
R.K.MISHRA

अब तेरे बिन घर मेरा ये घर नही लगता .
अब अँधेरो से मुझे भी डर नही लगता .

आयेगी तू लौट कर मुझको अभी भी है यकीं .
बेबसी तब तक रहेगी पर नही लगता .

रूप तेरा आ ही जाता है अँधेरी रात में .
चाँद सा चेहरा वो संगमरमर नही लगता .

तू जो थी तो जिंदगी भी चल रही थी साथ में .
अब जी सकूँगा एक पल अक्सर नही लगता .

उस नदी के पास जो तू एक दिन मुझसे मिली थी .
ढूढ़ता हूँ दरबदर पर वो दर नही लगता .

इन नतीज़ो की न माने तो मेरे इस दिल की सुन ले .
ये धड़कता है अभी पथ्थर नही लगता .

एक पौधा सींचता हूँ मैं मेरे इन आंशुओं से .
लाख़ चाहू पर अभी तो फर नही लगता .

ढह ही जायेंगे घरौंदे अश्क़ की बरसात से .
बच सकेंगे प्यार के मंज़र नही लगता .

×××

2 Comments

  1. Uttam Uttam 28/10/2015
  2. राम केश मिश्र राम केश मिश्र "राम" 30/10/2015

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