दीदार

घूंघट की आड में ऐसा क्या छुपाते हो
इक झलक की आस में कितना लुभाते हो

तेरी छवि से ही मदहोश पड़े हैं कई दिवाने
गहरी जुल्फों को झुका कर और क्यों सताते हो

रूप के चर्चे हुए हैं आम हर महफिल में
तारीफ के नगमों को अधूरा क्यों बताते हो

तेरी आभा से ही स्वर्णिम है जिन्दगी
यूँ बेदर्दी से दिल की लगी को क्यों बुझाते हो

दर दर भटक कर ढूंढा है तेरा ठिकाना
दिल की जमीन से दूर बसेरा क्यों बनाते हो

माना कि साँसे अटकी हैं तेरी हर अदा पर
अपनी अदाओं पर इतना क्यों इतराते हो

प्रेम के असीम दरिया के पार है मंजिल तेरी
डूब कर मर मिटने से नादान दिल घबराते क्यों हो

समर्पण का तिनका ही ले जाएगा भवसागर के पार
दिल के दर्पण में ईश्वर की परछाइयाँ क्यों बनाते हो

9 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/10/2015
    • Uttam Uttam 27/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/10/2015
    • Uttam Uttam 27/10/2015
  3. Girija Girija 27/10/2015
    • Uttam Uttam 27/10/2015
  4. Ashita Parida Ashita Parida 27/10/2015
    • Uttam Uttam 27/10/2015
  5. Ashita Parida Ashita Parida 27/10/2015

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