उलझे धागे

रंग बिरंगे उलझे धागे,
सुलझाने में मैं उलझा हूं ।
क्यूं उलझे और कैसे उलझे
इन प्रश्नों में मन उलझा है ।

कभी इधर से कभी उधर से,
सिरा ना कोई हाथ लगा
चेष्टा हर, हताश है लौटी,
हल ना कोई हाथ लगा ।

प्रेम के धागे सुलझाऊं जब,
अहंम आड़े आ जाता है ।
स्नेह और ममता जागृत हों जब,
मोह मन को भरमा जाता है ।

परमार्थ की राह कठिन है,
‘मैं ‘ और ‘मेरा’ भाव प्रबल
निस्वार्थ भी रह नहीं पाता,
इच्छाओं पर स्वार्थ सबल ।

धागे मेरी क्रियायों के
प्रतिक्रियायों संग उलझे हैं,
किसे संवारूं किसे नकारूं
प्रश्नोत्तर सभी अधूरे हैं ।

धैर्य, शान्ति, सहिष्णुता,
खो गए अन्धेरी राहों में
ममता, करुणा लुप्त हो गईं
कहीं सागर की गहराई में ।

पथ प्रदर्शक कौन बने अब,
कौन भरे मन में उत्साह,
कैसे सुलझें उलझे धागे,
कैसे रंग खिलें हर राह ?

कृष्ण बन अब तो आए कोई
अर्जुन को राह दिखाने को,
अन्तर्द्वन्द से उत्पीड़ित,
मेरी उलझन सुलझाने को ।

13 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar gupta 25/10/2015
    • bimladhillon 25/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 25/10/2015
    • bimladhillon 25/10/2015
  3. पवन पवन 25/10/2015
  4. bimladhillon 25/10/2015
  5. omendra.shukla omendra.shukla 26/10/2015
  6. bimladhillon 26/10/2015
  7. Girija Girija 26/10/2015
    • bimladhillon 26/10/2015
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/10/2015
  9. bimladhillon 26/10/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/10/2015

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