||सच्ची सुंदरता ||

सुन्दर से इस मुखड़े पे
फिर झुर्रियां कभी पड़ी होंगी
सागर सी नीली आखों में
धुंधली सी परत चढ़ी होगी

गुलाब सरीखे कपोलों पे
फिर सिकुड़न सी छा जाएगी
मूंगे सी इन अधरों की
मुस्कान कहीं खो जाएगी

मद में चूर यह यौवन भी
उम्र तले दब जायेगा
खाके प्रकृति की मार फिर
जीवन यह ढल जायेगा

जिसपे है हमें नाज सदा
वो यौवन एक दिन ढल जायेगा
जिस तन से है इतना प्यार
वो साथ सदा ना दे पायेगा

पर हृदयों की एकतता
और मन के सुन्दर भावों को
सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा
और वाणी की मधुरिमा को

ना प्रकृति कभी बदल पायेगी
ना बुढापन इसमें आयेगा
ये सदा रहेंगे एक स्थिति में
ना परिवर्तन इसमें आयेगा

तन की सुंदरता है इनसे
ना की शरीर के अवयवों से
सच्ची खूबसूरती है इनसे ही
ना की सुन्दर आकारों से ||

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/10/2015

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