||वेश्या जीवन ||

किससे कहु मै अपनी व्यथा
कौन यहाँ सुनाने को आता है
तन की भूख मिटाने को
चक्कर हर कोई यहाँ लगाता है

ना भावनाओं की फिक्र किसी को है
ना इच्छाओं का सम्मान यहाँ है
चाँद पैसों पे बिकती है इज्जत
हर रोज मिलते नए खरीददार यहाँ है

लुटाके बेशकीमती अश्मत मै अपनी
खुशियां चेहरे पे उनके लाती हूँ
समेट स्वयं में व्यभिचारी समाज को
अश्मत औरों की मै बचाती हूँ

झेलके हर दर्द सीने में अपने
खुश रहने का ढोंग रचाती हूँ
बिक हाथों में इज्जत के ठेकेदारों के
हर रोज यहाँ मै लूटी जाती हूँ

नाम यहाँ ना मेरा कोई
नामों में हर रोज मै बदली जाती हूँ
कभी चंपा,कभी चमेली,कभी ज्योति
इन नामों से पुकारी जाती हूँ

क्यूँ अधिकार नहीं मुझको
सम्मान यहाँ पे पाने का
हो मुक्त गंदे विचारों से
जीवन यहाँ पे जीने का

दस्तूर रहा है इस समाज का
गन्दगी यहाँ पे पूजी जाती है
नंगी तस्वीरों वाली अभिनेत्रियां
आदर्श यहाँ कहलाती है

करके अंग प्रदर्शन स्वयं
लोगो के विचारों को भड़काती है
कर समाज को दूषित ये
व्यभिचारों को नित्य बढाती है

समाज के अनैतिक सम्बन्धो में
कारण ये गिनी जाती है
बलात्कार जैसे मनोरोगों को
समाज में ये फैलाती है

क्यूँ फर्क है फिर हममें इतना
क्यूँ ओझी मै समझी जाती हूँ
रोटी के खातिर बिकते हुए
दम तोड़ यहाँ मै जाती हूँ

धोती हूँ समाज की गंदगी को
फिर भी तिरस्कार ही पाती हूँ
हो वशीभूत जीवन की आवश्यकताओं के
इस नरक में जीने को आती हूँ ||

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/10/2015
    • omendra.shukla omendra.shukla 25/10/2015

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