डा श्याम गुप्त के त्रिपदा अगीत-

त्रिपदा अगीत- -१६-१६ मात्राओं के तीन पदों वाला अतुकान्त गीत है जो अगीत कविता-विधा का एक छंद है—

१.
.अंधेरों की परवाह कोई,
न करे, दीप जलाता जाए;
राह भूले को जो दिखाए |
२.
सिद्धि प्रसिद्धि सफलताएं हैं,
जीवन में लाती हैं खुशियाँ;
पर सच्चा सुख यही नहीं है|
३.
चमचों के मजे देख हमने ,
आस्था को किनारे रखदिया ;
दिया क्यों जलाएं हमीं भला|
४.
जग में खुशियाँ उनसे ही हैं,
हसीन चेहरे खिलते फूल;
हंसते रहते गुलशन गुलशन |
५.
मस्त हैं सब अपने ही घरों में ,
कौन गलियों की पुकार सुने;
दीप मंदिर में जले कैसे ?
६.
तुमसे मिलने की खुशी भी है ,
न मिल पाने का गम भी;
कितने गम हैं जमाने में।
7.
खडे सडक इस पार रहे हम,
खडे सडक उस पार रहे तुम;
बीच में दुनिया रही भागती।
८.
कहके वफ़ा करेंगे सदा,
वो ज़फ़ा करते रहे यारो;
ये कैसा सिला है बहारो।

3 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 22/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/10/2015
  3. श्याम गुप्त shyamgupt 25/10/2015

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