राही और मंजिल

चले चल मुसाफिर चले चल सफर में
हो अनजान राहें न मुश्किल सफर है
बस तेरे ही भटकने का डर है
ख्वाबों में बुना था जो आशियाना
वो होने को आया पूरा खबर है
न मैनाक पर रुक
न दम भर को दम ले
हो अर्जुन निशाना तेरी नज़र है।
बायें हैं दायें हैं प्रलोभन बहुत हैं
पीछे अहम का कच्चा बंधन है
न अब तू बहक न कदम डगमगाना
जो तुझको हिलायें आकर्षण बहुत हैं
परीक्षा है जीवन तेरा दिवाने
जो अब न तू भटका तो तेरा चमन है।

2 Comments

  1. कुशवाह विकास कुशवाह विकास 21/10/2015
  2. Girija Girija 25/10/2015

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