मन के धागे

जलती आँखे देखीं हो मैंने उसकी
या झिड़की खाई हो झील किनारे तीखी
चाहा जब मैंने जीना जीती कला को,
ठहरी आँखों में बहकर प्राण सरीखी।

सच कहूँ तो ऐसी बात नहीं, मैं झिझकू
पल पल श्वांसो में लेकर जीता हूँ
लम्बी अलको गहरी पलकों में
खो मैं संग जीवन पीता हूँ ।

फिर भी लगता है अकसर मुझको
मुठ्ठी में जीवित मछली मैंने पकड़ी है
नग्न कटि छूकर, मुस्काकर गहरी
आँखों की बहती लाली जकड़ी है।

सम्मुख आने से सोच यही डरता हूँ
माथे की रेखाएं ही न बन जाऊ।
अपनी अयोग्यता को फहराकर मैं-
उससे न कहीं ठुकराया जाऊ ।

ये मन के धागे, उलझाते पर
क्यों बैठ जाऊ यूँ ही मैं हारा।
धारा हो कोई तो भी क्या, इस
नदिया का होगा कोई किनारा।

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/10/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/10/2015

Leave a Reply