हर पल सिसकता हूँ दबी सांसो तले, की गुमराह हुआ हूँ आज जिंदगी से कही

हर पल सिसकता हूँ दबी सांसो तले
की गुमराह हुआ हूँ आज जिंदगी से कही
अनकहे लब्जों में उलझा हुआ हूँ
खुद की ख्वाहिशो जैसा कहीं ,
हो गयी ख्वाहिशे दफ़न कहीं
वफ़ा की जुस्तजू में खोकर
जी चूका हु मौते कई
जिंदगी से बेफिक्र होकर ,
बनाके कफ़न तेरी मोहबत का
फिर रूह को जलाने चला हूँ
छोड़ सल्तनत इस जहाँ की
आज तुझे पाने चला हूँ ||

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 19/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 19/10/2015
  3. omendra.shukla omendra.shukla 19/10/2015

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