अभिलाषा

दो प्रिये तुम दर्द ऐसा , जो हृदय को रास आऐ ।

है अधर सुकुमार इनको मुसकुरा कर खोल दो ।
श्रुति को परम आनंद आये दो बोल ऐसे बोल दो ।।
सुधि के रहते भी सुधि विहिन हो जाऊं मै घायल होकर ।
पाकर तेरा मधुमय सपर्श जग जाऊं मैं जैसे सोकर ।।

तेरी मधुर मुसकान , बनकर तीर हृदय भेद जाऐ ।

दामिनी बन दमको अंतर में अनुरंजित अंतर को कर दो ।
बिखरा निज हीरक हास वास जीवन में सजीवता भर दो ।।
खुशियों से झूम उठे ये मन इठलाता करता हो नर्तन ।
आशा लहराये जीवन में तम बन जाए दृगों का अंजन ।।

देखकर अभियान तेरा दिल दो घडी को कॉप जाऐ ।

राज कुमार गुप्ता – “राज“

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 18/10/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 19/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/10/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 19/10/2015

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