* क्यों करते हो *

क्यों करते हो,

क्यों करते हो नवरात
दिल में नव वचन तुम धरते हो
नारी की सम्मान नहीं जो दिल में
फिर इतना कष्ट क्यों सहते हो ,

क्यों करते हो,

क्यों करते हो नमाज अदा
क्या अल्लाह का ठिकाना तुम्हें नहीं पता
अल्लाह के वन्दे का खिदमत छोड़
नव बार सर क्यों पटकते हो ,

क्यों करते हो ,

क्यों देतो हो तुम अजान
सच्ची भक्ति की क्या तुम्हें नहीं पहचान
मानवता पर तुम चुप रहते
झूठी आहे भरते हो ,

क्यों करते हो ,

क्यों करते हो तुम उपवास
जब तुम्हें मानवता की भूख की नहीं चाह
तुक्ष्य इच्छाओं के लिए
तुम आहे भरते हो ,

क्यों करते हो ,

क्यों करते हो तुम रोजा
जब दिल ने मानवता को नहीं खोजा
थाल सजा कर सिर्फ पकवान
को गटकते हो ,

क्यों करते हो।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 18/10/2015
  2. नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 18/10/2015

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