लोहे की पुकार

पवन के संग बहर ही है जो ध्वनि
हृदय के अंतरंग में भी इसकी पहुंच है
वह तो सच्चे मानव की ललकार है
जीवन श्रम की यह अमर जयकार है

लोहे के टुकड़ों से उत्पन्न यह ध्वनि
इसके लय में झूमता है जग सारा
ताल में इसके क्या आकर्षण है
अज्ञात ही खींचता ध्यान हमारा

इसमें निहित है लगन की महिमा
हर छंद निर्मित है शक्ति से
हर ठोकर में कठोरता कितनी
जिंदगी संवरती है इन्हीं ठोकरों से

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 16/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015

Leave a Reply