दिन

दिन जी रहा था धीरे-धीरे
पी रहा था हर पल जीवन के
मौत भी करीब थी लेकिन
मौत किसे अच्छी लगती है

गहरी हुई मौत की परछाइयाँ
दिन खो गया तम के कुँए में
फिर उस प्रकाशहीन गगन में
छीण प्रकट चांद तारे

नवीन चेतना से प्रेरित
फिर आलोक ने ललकारा था निशा को
यौवन के मद में न जाने कब
लपेट लिया तम ने उस निर्बल पुकार को

संहार ने की थी हुंकार जबरदस्त
पर मृत्यु निश्चित है हर किसी की
फिर वह तो मात्र एक निशा थी
मौत तो करोड़ों निशाओं की हो चुकी है

सूर्य का आगमन अटल है
माना इस तम का जाना जटिल है
मन से जीवन से दूषित समाज तन से
कठिन है कार्य यह एक दिए का
तम की बेडियां बिखर जाएँगी
जब ज्योतित होगी लौ हर हिए का

3 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 16/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/10/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/10/2015

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